क्या आपने कभी सुना है कुतिया महारानी के मंदिर के बारे
बुंदेलखंड क्षेत्र के झांसी जनपद में स्थित रेवन व ककवारा गांवों के बीच लिंक रोड पर कुतिया महारानी मां का एक मंदिर है, जिसमें काली कुतिया की मूर्ति स्थापित है। आस्था के केंद्र इस मंदिर में लोग प्रतिदिन पूजा करते हैं। श्रद्धालु यहां सुख-समृद्धि व परिवार एवं फसलों की खुशहाली की मन्नतें मांगते हैं। झांसी के मऊरानीपुर के गांव रेवन व ककवारा के बीच लगभग तीन किलोमीटर का फासला है। इन दोनों गांवों को आपस में जोडऩे वाले लिंक रोड के बीच सड़क किनारे एक चबूतरा बना है। इस चबूतरे पर एक छोटा सा मंदिरनुमा मठ बना हुआ है।
क्या हैं मंदिर बनने की कहानी?
रेवन गांव के पास ही एक और ककवारा गांव है। दोनों गांवों के बीच में ये मंदिर बना हुआ है। कहा जाता है कि एक कुतिया इन दोनों गांवों में रहती थी। गांव के किसी भी कार्यक्रम में वो खाना खाने पहुंच जाती थी। लोग भी उसे बेहद प्यार करते थे और खाना खिलाते थे। एक बार कुतिया दोनों गांव के बीच में थी। तभी रेवन गांव से रमतूला ( किसी कार्यक्रम में खाना खाने की सूचना के लिए बजाया जाने वाला यंत्र) बजने की आवाज आई। आवाज सुनते ही कुतिया खाना खाने के लिए गांव में पहुंच गई, लेकिन देर हो जाने की वजह से सब खाना खाकर उठ गए। तभी ककवारा गांव से रमतूला बजा। कुतिया खाना खाने के लिए वहां भी दौड़ गई, लेकिन खाना नहीं मिला।
गांव के बुजुर्ग सुधीर बताते हैं कि कुतिया बीमार थी। दौड़ते-दौड़ते थककर दोनों गांव के बीच में बैठ गई। भूख और बीमारी की वजह से उसने वहीं दम तोड़ दिया. गांव के लोगों ने कुतिया को उसी जगह पर दफना दिया। जिस जगह उसे दफनाया गया, वो स्थान पत्थर में तब्दील हो गया। लोगों ने इस चमत्कार को देखने के बाद वहां छोटा सा मंदिर बना दिया। कुछ साल बाद वहां पर उसकी एक मूर्ति भी स्थापित कर दी। ककवारा गांव की कटोरी देवी बताती हैं कि आने वाली दीवाली पर यहां धूमधाम से पूजा-अर्चना की जाती है, क्योंकि उसकी मौत इन्हीं दिनों में हुई थी। यहां मांगने से हर मुराद पूरी हो जाती है।
क्या हैं मंदिर बनने की कहानी?
रेवन गांव के पास ही एक और ककवारा गांव है। दोनों गांवों के बीच में ये मंदिर बना हुआ है। कहा जाता है कि एक कुतिया इन दोनों गांवों में रहती थी। गांव के किसी भी कार्यक्रम में वो खाना खाने पहुंच जाती थी। लोग भी उसे बेहद प्यार करते थे और खाना खिलाते थे। एक बार कुतिया दोनों गांव के बीच में थी। तभी रेवन गांव से रमतूला ( किसी कार्यक्रम में खाना खाने की सूचना के लिए बजाया जाने वाला यंत्र) बजने की आवाज आई। आवाज सुनते ही कुतिया खाना खाने के लिए गांव में पहुंच गई, लेकिन देर हो जाने की वजह से सब खाना खाकर उठ गए। तभी ककवारा गांव से रमतूला बजा। कुतिया खाना खाने के लिए वहां भी दौड़ गई, लेकिन खाना नहीं मिला।
गांव के बुजुर्ग सुधीर बताते हैं कि कुतिया बीमार थी। दौड़ते-दौड़ते थककर दोनों गांव के बीच में बैठ गई। भूख और बीमारी की वजह से उसने वहीं दम तोड़ दिया. गांव के लोगों ने कुतिया को उसी जगह पर दफना दिया। जिस जगह उसे दफनाया गया, वो स्थान पत्थर में तब्दील हो गया। लोगों ने इस चमत्कार को देखने के बाद वहां छोटा सा मंदिर बना दिया। कुछ साल बाद वहां पर उसकी एक मूर्ति भी स्थापित कर दी। ककवारा गांव की कटोरी देवी बताती हैं कि आने वाली दीवाली पर यहां धूमधाम से पूजा-अर्चना की जाती है, क्योंकि उसकी मौत इन्हीं दिनों में हुई थी। यहां मांगने से हर मुराद पूरी हो जाती है।

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